किशोरावस्था का समय
व्यक्ति के जीवन मे निर्णायक माना जाता है। यह भविष्य की आधारशिला है। किशोरावस्था
प्रायः अस्थिरता की अवस्था होती है। किशोरियों की मनःस्थिति के संदर्भ में कहा
जाता हैं कि एक क्षण में उनका उत्साह उच्चतम शिखर पर पहुंच जाता है तो दूसरे क्षण
में उनकी मनःस्थिति उदासी की गहराई में डूबने लगती है। संवेगात्मक परिपक्वता के
अभाव में मानसिक द्वंद्व, मानसिक संघर्ष और मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती
है। यद्यपि आज हमारे संविधान में एवं समाज
में महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त है, परन्तु
आज भी कही- कही थोड़ा -बहुत समाज में विशेषकर ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों
में महिलाओं के साथ भिन्न व्यवहार देखा जा
सकता है।
किशोरियों के प्रति
माता- पिता, अभिभावकों एवं समाज का विशिष्ट नकारात्मक अभिवृत्ति, किशोरियों
के सामाजिक और बौद्धिक विकास में बाधक है।
घर तथा समाज के वातावरण का प्रभाव किशोरियों के मानसिक स्वास्थ्य एवं शैक्षणिक
समायोजन पर बहुत पड़ता है। बालिकाओं में सुरक्षा की भावना प्रेम एवं स्नेह से आती
है, जोकि वो अपने माता- पिता एवं परिवार के अन्य सदस्यों से प्राप्त करते है।
प्रस्तुत शोध आलेख का
उद्देश्य ग्रामीण किशोरियों के घर समायोजन एवं सामाजिक समायोजन के बीच संबंधों का
अध्ययन करना है।
इस शोध में बक्सर जिला के
स्नातक स्तर की 50 ग्रामीण किशोरियों का नमूना लिया गया। आंकड़ों के संग्रह हेतु (bell Adjustment
Inventory ) शमशाद हुसैन द्वारा निर्मित प्रश्नावली का प्रयोग किया
गया। प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण t test विधि द्वारा किया
गया।
इस अध्ययन का उद्देश्य ग्रामीण किशोरियों में गृह समायोजन और सामाजिक समायोजन के बीच अंतर का विश्लेषण करना था। इसके लिए 50-50 प्रतिभागियों के दो समूहों का डेटा एकत्रित कर विश्लेषण किया गया।
परिणामों से यह स्पष्ट
हुआ कि ग्रामीण किशोरियों के घर समायोजन और सामाजिक समायोजन के बीच सकारात्मक एवं
सार्थक संबंध विद्यमान है। अर्थात, जो किशोरियाँ घर में संतोषजनक समायोजन कर पाती
हैं, वे सामाजिक परिवेश में भी अपेक्षाकृत बेहतर समायोजन करती हैं।
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