महात्मा गांधी की राजनीतिक
दृष्टि सत्ता-राजनीति के पारंपरिक विमर्श से मौलिक रूप से भिन्न थी। वे राजनीति को
केवल शासन या अधिकारों की लड़ाई के रूप में नहीं, बल्कि नैतिकता, आत्म-संयम और
सामाजिक उत्थान की प्रक्रिया के रूप में देखते थे। उनके लिए अहिंसा और सत्याग्रह न
तो मात्र राजनीतिक रणनीतियाँ थीं और न ही संघर्ष के औजार; वे व्यक्ति और समाज के नैतिक रूपांतरण की साधनाएँ थीं। यह
शोधपत्र गांधी की नैतिक राजनीति की मूल अवधारणाओं—जैसे सत्य, अहिंसा, आत्मबल, ग्रामस्वराज और आत्मशासन—का विश्लेषण करता है, और प्रतिपादित करता है कि गांधी का राजनीतिक चिंतन एक समग्र
नैतिक जीवन-दर्शन में रचाबसा था।
गांधी की अहिंसा केवल हिंसा
के विरोध की प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि करुणा, सहअस्तित्व और सामाजिक न्याय की सक्रिय प्रेरणा थी।
सत्याग्रह को उन्होंने अन्याय के विरुद्ध आत्मबल आधारित नैतिक प्रतिरोध की विधि के
रूप में परिभाषित किया, जिसका उद्देश्य
विरोधी का नैतिक रूपांतरण था, न कि उसका दमन।
ग्रामस्वराज की उनकी अवधारणा विकेन्द्रीकृत, आत्मनिर्भर और नैतिक समाज की कल्पना प्रस्तुत करती है, जो आज भी लोकतांत्रिक और विकासात्मक संकटों का एक वैकल्पिक
समाधान सुझाती है।
समकालीन समय में जब राजनीति
अक्सर जनसेवा से दूर होकर स्वार्थ और ध्रुवीकरण की ओर झुकी प्रतीत होती है, गांधी का चिंतन एक नैतिक पुनर्विचार की प्रेरणा प्रदान करता
है। यह शोध इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि गांधी की नैतिक राजनीति न केवल ऐतिहासिक
स्मृति है, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता
और भविष्य की दिशा भी है।
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