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VOL. 7, ISSUE 1 (2025)
लोक कला, लोक संगीत एवं लोक संस्कृति का वैश्विक प्रभाव
Authors
दीप्ति शर्मा, डॉ. रास बिहारी दास
Abstract
कला हर काल व स्थिति में समृद्ध होती है। लोक कलाएँ, बहुकोष साहित्य को धारण किए हुए है। लोक कलाएँ प्रत्यक्ष रूप से किसी देश व प्रांत के रीति-रिवाज़ों, त्यौहारों, परंपराओं को व्यक्त करती है। लोक कलाएँ, लोक संस्कृति को लोक संगीत के माध्यम से एक अभिव्यक्ति प्रदान करती है। समाज की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही मान्यताएँ, क्रियाकलाप जो हमारी लोक संस्कृति का अंग है वह विभिन्न लोक कलाओं व लोक संगीत के माध्यम से अभिव्यक्ति लेता है। इसी रूप में यह संरक्षण भी प्राप्त करता है व साथ-साथ समृद्ध भी होता जाता है। वैश्विक रूप में लोक संस्कृति, कलाएँ एवं संगीत प्रांतीय पहचान को व्यक्त करते है। यह न केवल एक पहचान बताते है अपितु एक राष्ट्र के दूसरे राष्ट्र के साथ संबंध को भी गहरा करते हैं।
हमारे भारत के लोकगीत, जैसे- कजरी, पारंपरिक लोक नृत्य जैसे- गरबा, गिद्दा, डांडिया, बिहू इत्यादि पूरे देश व विदेश में भी लोकप्रिय है। यह हमारे भारत की परंपराओं व संस्कृति को वैश्विक रूप में जीवंत रखता है।
लोक के साथ अन्य शैलियों को मिलाकर जब फ्यूज़न रूप दिया जाता है यह भारतीय व पाश्चात्य की जड़ों को एकता के साथ बांधता है।
ऑनलाइन कला शिक्षा के माध्यम से विदेशी छात्र भी दुनिया भर से एक दूसरे देशों की संस्कृति व लोक कलाओं, गीतों एवं नृत्यों का प्रशिक्षण ले सकते हैं। यह संस्कृति के प्रचार एवं प्रसार में भी सहायक है।
विभिन्न स्थानीय व वैश्विक कला महोत्सव हमारे भारत की समृद्ध संस्कृति 'विविधता में एकता' से भरी लोक कलाओं व गीतों को प्रत्यक्ष रूप देने में सहायक सिद्ध होते है।
लोक कलाएँ, लोक संगीत हमारी प्राचीन सभ्यता व संस्कृति का आईना है।
हमारे वेद, उपनिषद्, ऋचाएँ विश्व को हमारी धरोहर की नींव दर्शाती है।
वैश्विक पटल पर किसी राष्ट्र व प्रांत की लोक संस्कृति ही उस राष्ट्र/प्रांत की पहचान बताती है एवं उसका अस्तित्व होती है।
लोक सदा ही धरातल से जुड़ा होता है। लोक सदा से नींव होता है, संस्कृति व सभ्यता की।
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Pages:57-58
How to cite this article:
दीप्ति शर्मा, डॉ. रास बिहारी दास "लोक कला, लोक संगीत एवं लोक संस्कृति का वैश्विक प्रभाव". International Journal of Social Science and Humanities, Vol 7, Issue 1, 2025, Pages 57-58
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