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International Journal of
Social Science and Humanities
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VOL. 6, ISSUE 4 (2024)
ग्रामीण क्षेत्र के वयस्क अस्थि रोगियों पर सहजन की पत्तियों के सेवन के प्रभाव का अध्ययन
Authors
अरुणा राजे सिंह, डॉ० मोनिका गुप्ता, डॉ० शिखा खरे
Abstract
इस शोध पत्र का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र में अस्थि रोगों से पीड़ित वयस्क व्यक्तियों पर सहजन की पत्तियों के सेवन के प्रभावों का अध्ययन करना है। सहजन की पत्तियाँ अपनी पोषणीय गुणों और औषधीय विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध हैं। यह अध्ययन यह निर्धारित करने का प्रयास करेगा कि क्या सहजन की पत्तियाँ अस्थि रोगियों की स्वास्थ्य स्थिति में सुधार कर सकती हैं।इस अध्ययन का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले वयस्क अस्थि रोगियों पर सहजन की पत्तियों के सेवन के प्रभाव का मूल्यांकन करना है। सहजन (डवतपदहं वसमपमितं) की पत्तियाँ अपने पोषक तत्वों और औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध हैं, जिनमें कैल्शियम, फॉस्फोरस और एंटीऑक्सिडेंट शामिल हैं जो अस्थि स्वास्थ्य में सुधार कर सकते हैं। 
अध्ययन में 100 अस्थि रोगियों को शामिल किया गया, जिनकी उम्र 30 से 60 वर्ष के बीच थी। इन रोगियों को दो समूहों में विभाजित किया गया एक समूह को नियमित रूप से सहजन की पत्तियों का सेवन कराया गया, जबकि दूसरे समूह को मानक आहार दिया गया। अध्ययन की अवधि 6 महीने थी, जिसमें हर महीने हड्डियों की मजबूती और रोगियों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की जांच की गई।
अध्ययन के परिणामस्वरूप पाया गया कि सहजन की पत्तियों का सेवन करने वाले समूह में हड्डियों की मजबूती में सुधार देखा गया। इस समूह के रोगियों में कैल्शियम के स्तर में वृद्धि, जोड़ों के दर्द में कमी और समग्र अस्थि स्वास्थ्य में सकारात्मक बदलाव दर्ज किए गए। इसके विपरीत मानक आहार समूह में ऐसे सुधार कम देखने को मिले।
अध्ययन से निष्कर्ष निकला कि सहजन की पत्तियों का नियमित सेवन ग्रामीण क्षेत्र के वयस्क अस्थि रोगियों के लिए फायदेमंद हो सकता है और यह अस्थि रोगों के प्रबंधन में एक प्राकृतिक और प्रभावी उपाय के रूप में उपयोग किया जा सकता है। भविष्य में, इसके प्रभावों की गहन जांच के लिए बड़े पैमाने पर अध्ययन की आवश्यकता हो सकती है।
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Pages:20-23
How to cite this article:
अरुणा राजे सिंह, डॉ० मोनिका गुप्ता, डॉ० शिखा खरे "ग्रामीण क्षेत्र के वयस्क अस्थि रोगियों पर सहजन की पत्तियों के सेवन के प्रभाव का अध्ययन". International Journal of Social Science and Humanities, Vol 6, Issue 4, 2024, Pages 20-23
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