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VOL. 7, ISSUE 5 (2025)
सिंधु सभ्यता के पतन में नदीजन्य कारकों की भूमिका का अध्ययन
Authors
डॉ. नारायण लाल माली
Abstract
शोध सार - सिंधु सभ्यता संभवतः तत्कालीन विश्व की सभ्यताओं में सबसे अधिक विस्तृत भू-भाग पर पल्लवित-पुष्पित हुई थी। सिंधु और उसकी सहायक नदियों तथा अन्य स्थानों पर इसके 1000 से भी अधिक स्थल खोजे जा चुके हैं, जो भारत-पाक व अफगानिस्तान तक विस्तृत है। लगभग 1000 वर्ष तक अस्तित्व में रहने के बाद यह सभ्यता पतन की ओर अग्रसर हुई। इसके पतन के कारणों की पड़ताल करते हुए पुरातत्वविदों ने विभिन्न विचार व्यक्त किए हैं। अधिकांश विद्वान इस सभ्यता के पतन के लिए नदीजन्य कारकों को उत्तरदायी मानते हैं। सिंधु सभ्यता के अधिकांश नगर नदियों के तट पर विकसित हुए। विकास की चरमावस्था पर नदियों में आई बाढ़ के कारण उनके रिहाईशी व कृषि-भूमि क्षेत्र नष्ट हो गए। भूकंप या अन्य भूगर्भिक गतिविधियों के कारण नदियों के मार्ग बदल लेने से कृषि उत्पादन में कमी व व्यापारिक नगरों का ह्रास, वर्षा की कमी के कारण शुष्क जलवायु की स्थिति से अन्न उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव से उनका अन्य क्षेत्रों की ओर पलायन कर जाना आदि नदीजन्य कारक सिंधु सभ्यता के पतन के लिए उत्तरदायी ठहराए जाते हैं। यद्यपि लिखित एवं प्रामाणिक साक्ष्यों के अभाव में सिंधु सभ्यता के पतन के विषय में सटीक दावा नहीं किया जा सकता है। आज भी इसके पतन के कारण रहस्य बने हुए हैं और इस संबंध में खोज जारी है। हो सकता है इस सभ्यता के पतन के विषय मे भविष्य में कोई ठोस कारण निकल कर आए। प्रस्तुत शोध-आलेख में सर्वेक्षण एवं उत्खनन से प्राप्त अवशेषों के अध्ययन के आधार पर विभिन्न पुरातत्वविदों द्वारा सिंधु सभ्यता के पतन के लिए नदीजन्य कारकों को उत्तरदायी ठहराने की भूमिका की पड़ताल करने का प्रयास किया गया है।
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Pages:115-118
How to cite this article:
डॉ. नारायण लाल माली
"सिंधु सभ्यता के पतन में नदीजन्य कारकों की भूमिका का अध्ययन". International Journal of Social Science and Humanities, Vol 7, Issue 5, 2025, Pages 115-118
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