Logo
International Journal of
Social Science and Humanities
ARCHIVES
VOL. 7, ISSUE 1 (2025)
मेवाड़ की जल प्रबंधता “भणाय की बावड़ी के विशेष संदर्भ मे”
Authors
डॉ. हरि लाल बलाई
Abstract

भारतीय इतिहास में मेवाड़ के अदम्य साहस, अद्भुत शौर्य, अतुलनीय बलिदान, सहज समर्पण की अभिलाषा और सांस्कृति विरासत की सुदीर्घ परंपरा ने अपनी एक अलग ही पहचान बनाई है। मेवाड़ महाराणाओं ने प्राचीन समय से ही वर्षा जल को संग्रहित करने के लिए समुचित प्रबंध किए हैं क्योंकि मेवाड़ राज्य का अधिकांश भू-भाग पहाड़ी है जहां पर पेयजल सिंचाई हेतु वर्षा जल का संचयन करना अति आवश्यक था अन्यथा काल की स्थिति में विकेट पेयजल का सामना करना पड़ता था। प्रकृति ने भी दो तरह से जल दिया है एक वर्षा जल एवं दूसरा भू.गर्भ से प्राप्त जल। जल बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। महाराणाओं ने जल को सहेजने के लिए विभिन्न झीले, बावडियां, तालाब, कुए आदि जलाशयों का निर्माण करवाया था। ये जलाशय स्थापत्य कला के अनुपम उत्कृष्ट नमूने है जो आज दिखार्इ देते हैं।

राणा मोकल ने अपने भाई बाघसिंह की स्मृति मे बाघेला सरोवर बनवाया तथा अपनी प्रिय रानी गोरांबिका  की स्वर्ग प्राप्ति के निमित श्रृंगी ऋषि मे बावड़ी खुदवाई थी1 महाराणा राजसिंह की रानी रामरसदे ने देबारी के पास जया नाम की त्रिमुखी बावड़ी का निर्माण करवाया था राणी चारुमती  ने भी राजनगर मे बावड़ी बनवाई थी2 मेवाड़ महाराणाओं ने वर्षा जल को संग्रहित करने के लिए जयसमंद, राजसमंद, उदयसागर, पिछोला, फतहसागर आदि झीलों का निर्माण करवाया था मेवाड़ में कई तरह की बावड़ियां हैं जिनमे  एक मुखी, द्विमुखी, त्रिमुखी, चौमुखी बावडियां मिलती है।

यह बावडियां जल संरक्षण का संदेश देती हैं इन्हीं बावड़ियों में मेवाड़ के मांडलगढ़ परागने  में राजगढ़ के पास भणाय की बावड़ी अपनी विशालता कलात्मकता  एवं जल संचयन की दृष्टि से मेवाड़ के  इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखती है।
Download
Pages:52-53
How to cite this article:
डॉ. हरि लाल बलाई "मेवाड़ की जल प्रबंधता “भणाय की बावड़ी के विशेष संदर्भ मे”". International Journal of Social Science and Humanities, Vol 7, Issue 1, 2025, Pages 52-53
Download Author Certificate

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.