भारतीय इतिहास में
मेवाड़ के अदम्य साहस, अद्भुत शौर्य, अतुलनीय बलिदान, सहज समर्पण की अभिलाषा और सांस्कृतिक विरासत की सुदीर्घ परंपरा ने अपनी एक अलग ही पहचान बनाई है। मेवाड़ महाराणाओं ने प्राचीन समय से ही वर्षा जल को संग्रहित करने के लिए समुचित
प्रबंध किए हैं क्योंकि मेवाड़ राज्य का अधिकांश भू-भाग पहाड़ी है जहां पर पेयजल व सिंचाई हेतु वर्षा जल का संचयन करना अति आवश्यक था अन्यथा अकाल की स्थिति में
विकेट पेयजल का सामना करना पड़ता था। प्रकृति ने भी दो तरह से जल दिया है एक वर्षा जल एवं दूसरा
भू.गर्भ से प्राप्त जल। जल बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। महाराणाओं ने जल को सहेजने के लिए विभिन्न झीले, बावडियां, तालाब, कुए आदि जलाशयों का निर्माण करवाया था। ये जलाशय स्थापत्य कला के अनुपम उत्कृष्ट नमूने
है जो आज दिखार्इ देते हैं।
राणा मोकल ने अपने भाई बाघसिंह की स्मृति मे बाघेला सरोवर
बनवाया तथा अपनी प्रिय रानी गोरांबिका की
स्वर्ग प्राप्ति के निमित श्रृंगी ऋषि मे
बावड़ी खुदवाई थी।1 महाराणा राजसिंह की रानी रामरसदे
ने देबारी के पास जया नाम की त्रिमुखी बावड़ी का निर्माण करवाया था राणी
चारुमती ने भी राजनगर मे बावड़ी बनवाई थी।2 मेवाड़ महाराणाओं ने वर्षा जल को संग्रहित करने के लिए जयसमंद, राजसमंद,
उदयसागर, पिछोला, फतहसागर आदि झीलों का निर्माण करवाया था। मेवाड़ में कई तरह की बावड़ियां हैं जिनमे एक मुखी, द्विमुखी, त्रिमुखी, चौमुखी बावडियां मिलती है।
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