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VOL. 7, ISSUE 1 (2025)
18वीं शताब्दी के दौरान जाट प्रतिरक्षा व्यवस्था एवं स्थापत्यकला
Authors
राजेश
Abstract
18वीं शताब्दी भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण अवधि थी, जिसमें मुगल साम्राज्य का पतन और क्षेत्रीय शक्तियों का उदय हुआ। 17वीं शताब्दी के मध्य से ही मुगल दरबार में वास्तुकला, शिल्पकला तथा स्थापत्यकला को संरक्षण मिलना लगभग समाप्त हो गया था। औरंगजेब तथा उसके उत्तराधिकारियों द्वारा सत्ता के लिए किए गए संघर्षों ने कला को धरातल पर ला दिया था। शाही दरबार में समुचित स्थान न मिलने के कारण कलाकारों ने प्रांतीय राज्यों में अपने संरक्षक खोजने प्रारम्भ कर दिए। मुगलों के आगरा सूबे में नवस्थापित जाट रियासत के शासकों ठाकुर बदन सिंह, सूरजमल, जवाहर सिंह आदि को कला के प्रति अत्याधिक लगाव था। उन्होंने स्थापत्य कला में भारी रुचि ली, और साथ ही उसे संरक्षण भी दिया। उन्होंने राज्य के सर्वांगीण विकास तथा लोक कला के संरक्षण हेतु डीग, भरतपुर, कुम्हेर, वैर आदि स्थानों पर मैदानी दुर्ग बनवाये एवं राज्य के अधिकांश सीमांत भागों में स्थान-स्थान पर कच्ची गढ़ियाँ, विशाल तथा भव्य भवनों तथा हवेलियों, छतरियों, आकर्षक उद्यान, बांधों, नहरों, सरोवरों व जलाशयों मन्दिरों व मस्जिदों आदि का निर्माण कराया। इस समय वास्तुकारों, शिल्पियों, दक्ष व कुशल संगतरासों, उस्तादों, मिस्त्रियों व कारीगरों ने दिल्ली, आगरा तथा जयपुर से आकर जाट रियासत में रोजगार प्राप्त कर अपनी कला का विकास किया। एक तरफ जहाँ जाट राज्य के शासक वर्ग द्वारा राज्य के केन्द्र डीग व भरतपुर में वास्तुकला का विकास किया जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ राज्य द्वारा संरक्षित सरदारों ने भी स्थानीय स्थापत्य कला को संरक्षण प्रदान किया। इस प्रकार जाटों ने दुर्ग, महल, बगीचे आदि बनवाकर अपनी प्रतिरक्षा एवं स्थापत्य कला के परिदृश्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह शोध पत्र इस अवधि के दौरान जाटों की प्रतिरक्षा एवं स्थापत्य कला अर्थात दुर्ग निर्माण एवं भवन निर्माण शिल्प योगदान की पड़ताल करता है, जिसमें उनके किलेबंदी, और महलों पर जोर दिया गया है, जो मुगल और राजपूत परंपराओं से स्वदेशी शैलियों और प्रभावों का मिश्रण दर्शाता है।
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Pages:22-25
How to cite this article:
राजेश "18वीं शताब्दी के दौरान जाट प्रतिरक्षा व्यवस्था एवं स्थापत्यकला". International Journal of Social Science and Humanities, Vol 7, Issue 1, 2025, Pages 22-25
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