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International Journal of
Social Science and Humanities
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VOL. 6, ISSUE 3 (2024)
18वीं शताब्दी के रुहेलखण्ड में रुहेला अफ़गानों की सामाजिक व्यवस्था का स्वरूप
Authors
डॉ. सुधीर कुमार वर्मा
Abstract
भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही रुहेला अफगान मध्य एशिया के रोह पहाड़ी क्षेत्र से आकर उत्तर भारत के कटेहर क्षेत्र में प्रवासित हुए और अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक इन्हीं रुहेला अपफगानों के द्वारा इस क्षेत्र पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर ली गई। कटेहर क्षेत्र में रुहेलों की सत्ता स्थापना के कारण ही इसको रुहेलखण्ड के नाम से जाना जाने लगा।1 कटेहर क्षेत्र में रुहेलों के प्रवास के कारण मूलतः आर्थिक ही नजर आते हैं क्योंकि यह अपने मूल स्थान एशिया (खोरासान) की विषम भौगोलिक परिस्थितियों एवं जीविका की कठिन परिस्थितियों के कारण ही अपने बेहतर भविष्य की तलाश में यहाँ पर आये थे।2 जबकि दूसरी तरफ रुहेलखण्ड की सैन्य व्यवस्था में उन्हें बेहतर रोजगार की प्राप्ति हो रही थी। साथ ही उत्तर-पश्चिम से होने वाले व्यापार में भी अफगानों की पर्याप्त संलग्नता बनी हुई थी विशेषकर घोड़ों के व्यापार में पाविन्दा, युसुफजई जैसे अफगान कबीलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। परंतु इस प्रवास की प्रक्रिया का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष भी था। वह था सामाजिक-सांस्कृतिक एवं वैचारिक आदान-प्रदान की परंपरा, जिसको समझने के लिए रुहेलों की सामाजिक एवं वैचारिक व्यवस्था का अध्ययन करना आवश्यक हो जाता है। प्रस्तुत शोधपत्र में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि यहाँ पर प्रवासित होने वाले रुहेला किस प्रकार अपनी सामाजिक प्रासंगिकता साबित कर रहे थे? अर्थात् कौन-सी गतिविधियों में अपने को संलग्न कर रहे थे? उसका सामाजिक महत्त्व क्या था? इसके अतिरिक्त इस बात का भी अध्ययन किया गया है कि रुहेलों की परंपरागत सामाजिक संरचना क्या थी और उसमें यहाँ पर क्या व्यवहारगत परिवर्तन आये?भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही रुहेला अफगान मध्य एशिया के रोह पहाड़ी क्षेत्र से आकर उत्तर भारत के कटेहर क्षेत्र में प्रवासित हुए और अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक इन्हीं रुहेला अपफगानों के द्वारा इस क्षेत्र पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर ली गई। कटेहर क्षेत्र में रुहेलों की सत्ता स्थापना के कारण ही इसको रुहेलखण्ड के नाम से जाना जाने लगा।1 कटेहर क्षेत्र में रुहेलों के प्रवास के कारण मूलतः आर्थिक ही नजर आते हैं क्योंकि यह अपने मूल स्थान एशिया (खोरासान) की विषम भौगोलिक परिस्थितियों एवं जीविका की कठिन परिस्थितियों के कारण ही अपने बेहतर भविष्य की तलाश में यहाँ पर आये थे।2 जबकि दूसरी तरफ रुहेलखण्ड की सैन्य व्यवस्था में उन्हें बेहतर रोजगार की प्राप्ति हो रही थी। साथ ही उत्तर-पश्चिम से होने वाले व्यापार में भी अफगानों की पर्याप्त संलग्नता बनी हुई थी विशेषकर घोड़ों के व्यापार में पाविन्दा, युसुफजई जैसे अफगान कबीलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। परंतु इस प्रवास की प्रक्रिया का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष भी था। वह था सामाजिक-सांस्कृतिक एवं वैचारिक आदान-प्रदान की परंपरा, जिसको समझने के लिए रुहेलों की सामाजिक एवं वैचारिक व्यवस्था का अध्ययन करना आवश्यक हो जाता है। प्रस्तुत शोधपत्र में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि यहाँ पर प्रवासित होने वाले रुहेला किस प्रकार अपनी सामाजिक प्रासंगिकता साबित कर रहे थे? अर्थात् कौन-सी गतिविधियों में अपने को संलग्न कर रहे थे? उसका सामाजिक महत्त्व क्या था? इसके अतिरिक्त इस बात का भी अध्ययन किया गया है कि रुहेलों की परंपरागत सामाजिक संरचना क्या थी और उसमें यहाँ पर क्या व्यवहारगत परिवर्तन आये?
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Pages:11-14
How to cite this article:
डॉ. सुधीर कुमार वर्मा "18वीं शताब्दी के रुहेलखण्ड में रुहेला अफ़गानों की सामाजिक व्यवस्था का स्वरूप". International Journal of Social Science and Humanities, Vol 6, Issue 3, 2024, Pages 11-14
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