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VOL. 5, ISSUE 1 (2023)
मध्यकालीन भारत की आर्थिक जीवनशैली पर एक अध्ययन
Authors
अमित कुमार
Abstract
मध्यकालीन आर्थिक जीवन का प्रमुख आधार कृषि रहा है। जनसंख्या का अधिकांश भाग ग्रामीण होने की वजह से कृषि को प्रमुख महत्त्व प्रदान किया गया। क्योंकि अर्थव्यवस्था किसी भी समाज की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता होती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था व भू-राजस्व कर जोकि राज्य की आय का प्रमुख स्त्रोत होती है। यहाँ पर हम दिल्ली सल्तन्त से लेकर मुगलकाल प्रारंभिक राजस्व व्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे। भारत वर्ष के पास हमेशा ही कृषि का एक बड़ा भू-भाग रहा है। इब्नबतूता द्वारा ऐसी साफ पुष्टि की जाती है। बड़ी संख्या में पशुधन थे, यह पशु भी आय का प्रमुख स्त्रोत रहा। अलाउद्दीन खिलजी द्वारा चराई कर लगाया जाना, इस पर इस बात का प्रमाण है कि पशु-पालन से भी आप बड़ी मात्रा में होती थी। पशुओं के गोबर की खाद का प्रयोग भी कृषि में किया गया होगा, इसका अनुमान सहजरूप से लगाया जा सकता है। अलाउद्दीन ने भू-राजस्व का 50 प्रतिशत कर निर्धारण किया फिर भी किसानों द्वारा विद्रोह नहीं हुआ। इससे साफ पता चलता है कि किसानों की स्थिति अच्छी रही होगी। फिरोज तुगलक द्वारा सिंचाई को बढ़ावा देना भी कृषि को प्रोत्साहन की ही एक पहल रही होगी। मुगलों के समय भी भू-राजस्व का प्रमुख योगदान रहा है। यह भूमि पर कर ना होकर उपज या उत्पादन पर कर होता था। आइन-ए-अकबरी के अन्दर वर्णन आता है कि भू-राजस्व द्वारा दिए जाने वाले सरंक्षण व न्याय व्यवस्था के बदले लिया जाने वाला सम्प्रभुता शुल्क था। एतमाद खाँ ने 1563 ई॰ में एक प्रयोग किया, 1564 ई॰ में मुजफ्फर खाँ के अधीन, 1571 ई॰ में पुनः मुजफ्फर खाँ उसके साथ टोडरमल ने किया।
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Pages:6-7
How to cite this article:
अमित कुमार "मध्यकालीन भारत की आर्थिक जीवनशैली पर एक अध्ययन". International Journal of Social Science and Humanities, Vol 5, Issue 1, 2023, Pages 6-7
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