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International Journal of
Social Science and Humanities
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VOL. 4, ISSUE 1 (2022)
घरेलू हिंसा से जूझती भारतीय महिलाएः मानवीय अधिकारों का हनन
Authors
डॉ. सुनीता पारीक
Abstract
मानव अधिकार अर्थात वह अधिकार जो मनुष्य होने के नाते सभी व्यक्तियों को मिले हैं। 10 दिसंबर 1948 को मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा सयुंक्त राष्ट्र संघ द्वारा की गई, और समाज के हर एक व्यक्ति को आज़ादी, समानता और गरिमा से संबंधित अधिकार मिले। भारत में भी मानव होने के नाते सभी व्यक्तियों को यह अधिकार मिले हैं, किंतु अभी भी महिलाएं पूर्ण रूप से इन अधिकारों को नहीं भोग पा रही है।समाज में व्याप्त हिंसात्मक गतिविधियां महिलाओं को इन मानवीय अधिकारों से वंचित कर रही है। बाहर होने वाली छेड़छाड़ की घटनाएं, एसिड अटैक, कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ सेक्सुअल हैरेसमेंट की घटनाएं इत्यादि का सामना कर रही है, और सोचने वाली बात ये है कि ये सब घटनाएं तब संभव हो पाती है जब महिला घर से बाहर निकलती है, लेकिन विडंबना ये है कि अगर महिलाएं घर के चार दीवारी के अंदर है तब भी वे सुरक्षित नहीं है। अपने ही परिचितों या परिजनों के द्वारा वह घर में ही हिंसा का शिकार हो रही है जिसे हम घरेलू हिंसा के नाम से जानते हैं। कितनी भयानक स्थिति है ये जहां एक महिला अपने ही श्रम के द्वारा घर में सभी सदस्यों की सभी जरूरतों का ध्यान रखती है, और उसी घर में वह खुद अपनो के द्वारा हिंसा का शिकार भी बनती है। चूंकि महिलाएं सदियों से दोहरे दर्जे का जीवन जीती आई है और समाज में पुरुषों के द्वारा ही उन्हें दूसरे दर्जे की स्थिति पर रखा गया है, इसलिए वे समाज में पुरुषो के द्वारा हिंसा का शिकार बनती है। घरेलू हिंसा जो आमतौर पर सबसे छुपकर की जाती है, क्योंकि बंद कमरे में महिला पर किया गए अत्याचारों को चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक कोई नहीं देखता, और कई बार खुद महिला द्वारा भी इस दर्द को छुपाया जाता है। पर चोट से पीड़ित महिला के शरीर पर दिखने वाले निशान फिर भी देखे जा सकते हैं पर महिला के मन मस्तिष्क पर लगे घाव नही देखे जा सकते। किसी को कुछ भी ना कह पाने और न बता पाने की स्थिति में महिलाएं कई बार अवसाद का शिकार हो जाती हैं, और वे आत्महत्या करने को भी उतारू हो जाती हैं, इसीलिए सरकार के द्वारा महिलाओं को इस घरेलू हिंसा से मुक्ति दिलवाने के लिए 2005 में घरेलू हिंसा सुरक्षा अधिनियम बनाया गया। हालाकि इस अधिनियम के द्वारा महिलाओं को घर में होने वाली हिंसा से बचाने का पुरजोर प्रयास किया गया, लेकिन इस एक्ट के द्वारा भी महिलाओं को घर में होने वाली हिंसा से बचाना तभी संभव है जब कोई औरत जो घरेलू हिंसा से प्रताड़ित है वह खुद या पीड़ित महिला के पक्ष में अन्य कोई और इस अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज करें। लेकिन हकीकत में इस एक्ट के बनने के बाद भी अभी भी महिलाओं के प्रति घर में होने वाली हिंसा के मामलों में कमी नहीं आई है क्योंकि अधिकांशतः महिलाओं की चुप्पी ही उन्हें और अधिक घरेलू हिंसा को झेलने पर मजबूर करती है। सच्चाई ये है कि आज भी महिलाएं हिंसा को झेलते हुए अपना जीवन गुजार रही है। प्रस्तुत शोध पत्र के द्वारा मानव अधिकार की महिलाओं के संदर्भ में भूमिका, घरेलू हिंसा के कारण, परिस्थितियां, सुझाव, समाधान और घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के बारे में बताने का प्रयास किया गया है।
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Pages:63-66
How to cite this article:
डॉ. सुनीता पारीक "घरेलू हिंसा से जूझती भारतीय महिलाएः मानवीय अधिकारों का हनन". International Journal of Social Science and Humanities, Vol 4, Issue 1, 2022, Pages 63-66
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