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International Journal of
Social Science and Humanities
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VOL. 2, ISSUE 1 (2020)
विश्व व्यापार संगठन और भारतः चुनौतियों एवं सम्भवनाएं
Authors
डॉ. पुष्पा देवांगन, डॉ. बलभद्र प्रसाद देवांगन
Abstract
वर्तमान युग बजारोन्मुखी अर्थव्यवस्था पर आधारित है और समस्त राष्ट्र इसे विकास आघार बनाया है। बल्कि यदि हम यह कहें कि राष्ट्र के विकास का आधार बाजार है, तो कोई अतिस्योक्ति नही होगी। और इसी बाजार के सफल संचालन के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओ यथा गैट, विश्व व्यापार संगठन अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोश जैसी संथाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसलिए भारत जैसे विश्व के समस्त राष्ट्रों ने एैसी संस्थाओं में अपनी आस्था तथा विश्वास प्रकट करता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां परिवर्तित होती नजर आती है। इसके बहुत सारे कारण गिनाए जा सकते है। जैसे-शीत युद्ध की उत्पत्ति, एशिया, अफ्रिका तथा लैटिन अमेरिकी राष्ट्रों से उपनिवेशवाद की समाप्ति, गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का जन्म, अंतर्राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश का बनना, संयुक्त राष्ट्र संघ का बनना। इसके आलावा बहुत से ऐसे कारण है जो विश्व की परिस्थितियों को परिवर्तित किया इसमें सबसे प्रमुख है- उदारीकरण, भूमण्डलीकरण और निजीकरण जिनको GLIP कहा गया। वस्तुतः इसकी शुरूआत 1948 के GATT के समय से शुरू हो चुका था। लेकिन इसका स्पष्ट रूप सन् 1995 में विश्व व्यापार संगठन के रूप में दिखाई पडता है। जब इसे 1 जनवरी 1995 को शुरू किया गया। तब इस संगठन से उम्मीदें बहुत ज्यादा थी। क्योंकि इसके उद्देश्य स्पष्ट थे-व्यापार में अडचने खत्म करना, संरक्षणवाद पर लगाम कसना और विकासशील देशों को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों तक पहुॅचने का मौका देना। लेकिन हुआ कुछ अलग ही राजनीति गुटबाजी, कड़क संरचना तेज कदम, इन मुद्दों से जुडे सवालों का विश्व व्यापार संगठन के पास कोई जवाब नही है। आज विश्व व्यापार संगठन के 20 साल पुरे हो चुके हैं, लेकिन इस संगठन को जिस अवस्था को प्राप्त करना था। उसे प्राप्त करने में नाकाम रहा है। इसका कारण विकसित एवं विकासशील देशों के बीच मतांतर का है। जिसका प्रभाव इस संगठन पर दिखाई पड़ रहा है। जिसका विश्लेषण करना अत्यन्त आवश्यक है।
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Pages:42-45
How to cite this article:
डॉ. पुष्पा देवांगन, डॉ. बलभद्र प्रसाद देवांगन "विश्व व्यापार संगठन और भारतः चुनौतियों एवं सम्भवनाएं". International Journal of Social Science and Humanities, Vol 2, Issue 1, 2020, Pages 42-45
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